"चिकित्सा समाज सेवा है,व्यवसाय नहीं"

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Monday, 10 April 2017

10 अप्रैल -महात्मा हैनीमेन की 263 वीं जयंती पर विशेष : विजय राजबली माथुर

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10 अप्रैल -महात्मा हैनीमेन जयंती पर विशेष : 

डॉ हैनीमेन का जन्म 10 अप्रैल सन 1755 ई .को जर्मन साम्राज्य के अंतर्गत सेकसनी प्रदेश के 'माइसेन 'नामक एक छोटे से गाँव मे हुआ था और 02 जूलाई सन 1843 ई .मे नवासी वर्ष की आयु मे उनका निधन हुआ। "कीर्तिर्यस्य स जीवति"= इस असार संसार को छोडने से पूर्व डॉ हैनीमेन 'चिकित्सा-विधान'मे एक अक्षय कीर्ति स्थापित कर गए। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार डॉ हैनीमेन जर्मनी के एक कीर्ति प्राप्त उच्च -पदवी धारी एलोपैथिक चिकित्सक थे। अनेकों बड़े-बड़े चिकित्सालयों मे बहुत से रोगियों का इलाज करते हुये उनके ध्यान मे यह बात आई कि अनुमान से रोग निर्वाचन (DIAGNOSIS) कर,और कितने ही बार अनुमान पर निर्भर रह कर दवा देने के कारण भयंकर हानियाँ होती हैं,यहाँ तक कि बहुत से रोगियों की मृत्यु तक हो जाया करती है। इन बातों से उन्हें बेहद वेदना हुई और अंततः उन्होने इस भ्रमपूर्ण चिकित्सा (एलोपैथी )द्वारा असत उपाय से धन-उपार्जन करने की लालसा ही त्याग दी एवं निश्चय किया कि अब वह पुस्तकों का अनुवाद करके अपना जीविकोपार्जन करेंगे। इसी क्रम मे एक दिन एक-'मेटिरिया मेडिका' का अनुवाद करते समय उन्होने देखा कि शरीर स्वस्थ रहने पर यदि सिनकोना की छाल सेवन की जाये तो 'कम्प-ज्वर'(जाड़ा-बुखार)पैदा हो जाता है और सिनकोना ही कम्प-ज्वर की प्रधान दवा है। यही बोद्ध डॉ हैनीमेन की नवीन चिकित्सा पद्धति के आविष्कार का मूल सूत्र हुआ। इसके बाद इसी सूत्र के अनुसार उन्होने अनेकों भेषज-द्रव्यों का स्वंय सेवन किया और उनसे जो -जो लक्षण पैदा हुये ,उनकी परीक्षा की । यदि किसी रोगी मे वे लक्षण दिखाई देते तो उसी भेषज-द्रव्य को देकर वह रोगी को 'रोग-मुक्त'भी करने लगे।

डॉ हैनीमेन अभी तक पहले की भांति एलोपैथिक अर्थात स्थूल मात्रा मे ही दवाओं का प्रयोग करते थे। परंतु उन्हे यह एहसास हुआ कि रोग,आरोग्य हो जाने पर भी कुछ दिन बाद रोगी मे दुबारा बहुत सारे अनेक लक्षण पैदा हो जाते हैं। जैसे किनाइन का सेवन करने पर ज्वर तो आरोग्य हो जाता है ,परंतु उसके बाद रोगी मे --रक्त हीनता,प्लीहा,यकृत,पिलई,शोथ (सूजन ),धीमा बुखार आदि अनेक नए-नए उपसर्ग पैदा होकर रोगी को एकदम जर्जर बना डालते हैं। बस उसी एहसास के बाद से उन्होने दवा की मात्रा घटानी आरम्भ कर दी। इससे उन्हें यह मालूम हुआ कि,परिमाण या मात्रा भले ही कम हो ,आरोग्य दायिनी शक्ति पहले की तरह ही मौजूद रहती है और दुष्परिणाम भी पैदा नहीं होते।

अन्त मे उन्होने दवा का परिमाण क्रमशः भग्नांश के आकार मे प्रयोग करना आरम्भ किया और वे भग्नांश दवाएं फ्रेंच स्प्रिट,दूध की चीनी (शुगर आफ मिल्क)और चुयाया हुआ पानी (डिस्टिल्ड वाटर)इत्यादि औषद्ध-गुण विहीन चीजों के साथ मिला कर प्रयोग करना शुरू किया। यही नियम इस समय -'सदृश्य-विधान' कहलाता है जिसे डॉ हैनीमेन के नाम पर 'होम्योपैथिक-चिकित्सा' कहा जाता है। 

होम्योपैथी का 'सदृश्य -विधान' हमारे देश के 'आयुर्वेद' के सदृश्य सिद्धान्त से मेल खाता है। होम्योपैथी दवाएं होती भी हैं बहुत कम कीमत की। पहले होम्योपैथी चिकितक कोई कनसलटेशन चार्ज या परामर्श शुल्क भी नहीं लेते थे। एलोपैथी चिकित्सकों की भांति होम्योपैथी चिकित्सक कोई गरूर या घमंड भी नहीं रखते थे। अधिकांश होम्योपैथी चिकित्सकों के पीछे यह स्लोगन लिखा होता था-I TREATS,HE CURES.तब यह चिकित्सा पद्धति जनता की प्रिय चिकित्सा पद्धति थी।

गत 4-5 वर्षों से एलोपैथी चिकित्सा क्षेत्र मे फैले कमीशन वाद ने इस जन-चिकत्सा पद्धति (होम्योपैथी )को भी अपनी गिरफ्त मे ले लिया है। अब डॉ को कमीशन की रकमे बढ़ा दी गई हैं और विदेश दौरे के पेकेज जैसे एलोपैथी डॉ को मिलते थे वैसे ही मिलने लगे हैं। बाजार वाद के प्रभाव ने इस चिकित्सा पद्धति को भी मंहगा बनाना प्रारम्भ कर दिया है। यह महात्मा हैनीमेन की सोच के विपरीत है। आज जब हम डॉ हैनीमेन की 263  वी जयंती मना रहे हैं तो एक बार इस बात का भी मनन करें कि जिस एलोपैथी चिकित्सा की बुराइयों से त्रस्त होकर डॉ हैनीमेन ने नई जनोपयोगी चिकित्सा पद्धति का सृजन किया था उसे पुनः एलोपैथी की बुराइयों मे फँसने से बचाया जाये। वही डॉ हैनीमेन को सच्ची श्रद्धांजली होगी।  

Friday, 22 January 2016

आज रोग और प्रदूषण वृद्धि क्यों? ------ विजय राजबली माथुर

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Monday, February 28, 2011


चिकित्सा समाज सेवा है -व्यवसाय नहीं ------ विजय राजबली माथुर

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 ब मैंने 'आयुर्वेदिक दयानंद मेडिकल कालेज,'मोहन नगर ,अर्थला,गाजियाबाद  से आयुर्वेद रत्न किया था तो प्रमाण-पत्र के साथ यह सन्देश भी प्राप्त हुआ था-"चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं".मैंने इस सन्देश को आज भी पूर्ण रूप से सिरोधार्य किया हुआ है और लोगों से इसी हेतु मूर्ख का ख़िताब प्राप्त किया हुआ है.वैसे हमारे नानाजी और बाबाजी भी लोगों को निशुल्क दवायें दिया करते थे.नानाजी ने तो अपने दफ्तर से अवैतनिक छुट्टी लेकर  बनारस जा कर होम्योपैथी की बाकायदा डिग्री हासिल की थी.हमारे बाबूजी भी जानने वालों को निशुल्क दवायें दे दिया करते थे.मैंने मेडिकल प्रेक्टिस न करके केवल परिचितों को परामर्श देने तक अपने को सीमित रखा है.इसी डिग्री को लेकर तमाम लोग एलोपैथी की प्रेक्टिस करके मालामाल हैं.एलोपैथी हमारे कोर्स में थी ,परन्तु इस पर मुझे भी विशवास नहीं है.अतः होम्योपैथी और आयुर्वेदिक तथा बायोकेमिक दवाओं का ही सुझाव देता हूँ.


एलोपैथी चिकित्सक अपने को वरिष्ठ मानते है और इसका बेहद अहंकार पाले रहते हैं.यदि सरकारी सेवा पा गये तो खुद को खुदा ही समझते हैं.जनता भी डा. को दूसरा भगवान् ही कहती है.आचार्य विश्वदेव जी कहा करते थे -'परहेज और परिश्रम' सिर्फ दो ही वैद्द्य है जो इन्हें मानेगा वह कभी रोगी नहीं होगा.उनके प्रवचनों से कुछ चुनी हुयी बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-

उषापान-उषापान करके पेट के रोगों को दूर कर निरोग रहा जा जा सकता है.इसके लिए ताम्बे के पात्र में एक लीटर पानी को उबालें और ९९० मि.ली.रह जाने पर चार कपड़ों की तह बना कर छान कर ताम्बे के पात्र में रख लें इसी अनुपात में पानी उबालें.प्रातः काल में सूर्योदय से पहले एक ग्लास से प्रारम्भ कर चार ग्लास तक पियें.यही उषा पान है.

बवासीर-बवासीर रोग सूखा  हो या खूनी दस से सौ तक फिर सौ से दस तक पकी निम्बोली का छिलका उतार कर प्रातः काल निगलवा कर कल्प करायें,रोग सदा के लिए समाप्त होगा.

सांप का विष-सांप द्वारा काटने पर उस स्थान को कास कर बाँध दें,एक घंटे के भीतर नीला थोथा तवे पर भून कर चने के बराबर मात्रा में मुनक्का का बीज निकल कर उसमें रख कर निगलवा दें तो विष समाप्त हो जायेगा.
बिच्छू दंश-बिच्छू के काटने पर (पहले से यह दवा तैयार कर रखें) तुरंत लगायें ,तुरंत आराम होगा.दवा तैयार करने के लिये बिच्छुओं को चिमटी से जीवित पकड़ कर रेक्तीफायीड स्प्रिट में डाल दें.गलने पर फ़िल्टर से छान कर शीशी में रख लें.बिच्छू के काटने पर फुरहरी से काटे स्थान पर लगायें.

डायबिटीज-मधुमेह की बीमारी में नीम,जामुन,बेलपत्र की ग्यारह-ग्यारह कोपलें दिन में तीन बार सेवन करें अथवा कृष्ण गोपाल फार्मेसी ,अजमेर द्वारा निर्मित औषधियां  -(१)शिलाज्लादिव्री की दो-दो गोली प्रातः-सायं दूध के साथ तथा (२) दोपहर में गुद्च्छादिबूरीके अर्क के साथ सेवन करें.

थायराड-इस रोग में दही,खट्टे ,ठन्डे,फ्रिज के पदार्थों से परहेज करें.यकृतअदि लौह पानी के साथ तथा मंडूर भस्म शहद के सेवन करें.लाभ होगा.

श्वेत दाग-श्वेत्रादी रस एक-एक गोली सुबह -शाम बापुच्यादी चूर्ण पानी से सेवन करें.
(मेरी राय में इसके अतिरिक्त बायोकेमिक की साईलीशिया 6 X का 4 T D S  सेवन शीघ्र लाभ दिलाने में सहायक होगा)

आज रोग और प्रदूषण वृद्धि  क्यों?-आचार्य विश्वदेव जी का मत था कि नदियों में सिक्के डालने की प्रथा आज फिजूल और हानिप्रद है क्योंकि अब सिक्के एल्युमिनियम तथा स्टील के बनते हैं और ये धातुएं स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद हैं.जब नदियों में सिक्के डालने की प्रथा का चलन हुआ था तो उसका उद्देश्य नदियों के जल को प्रदूषण-मुक्त करना था.उस समय सिक्के -स्वर्ण,चांदी और ताम्बे के बनते थे और ये धातुएं जल का शुद्धीकरण करती हैं.अब जब सिक्के इनके नहीं बनते हैं तो लकीर का फ़कीर बन कर विषाक्त धातुओं के सिक्के नदी में डाल कर प्रदूषण वृद्धी नहीं करनी चाहिए.

 नदी जल के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण आचार्य विश्वदेव जी मछली -शिकार को भी मानते थे.उनका दृष्टिकोण था कि कछुआ और मछली जल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और काई को खा जाते थे जिससे जल शुद्ध रहता था.परन्तु आज मानव इन  प्राणियों  का  शिकार कर लेता है जिस कारण नदियों का जल प्रदूषित रहने लगा है.

क्षय रोग की त्रासदी-आचार्य विश्वदेव जी का दृष्टिकोण था कि मुर्गा-मुर्गियों का इंसानी भोजन के लिये शिकार करने का ही परिणाम आज टी.बी.त्रासदी के रूप में सामने है.पहले मुर्गा-मुर्गी घूरे,कूड़े-करकट से चुन-चुन कर कीड़ों का सफाया करते रहते थे.टी.बी. के थूक,कफ़ आदि को मुर्गा-मुर्गी साफ़ कर डालता था तो इन रोगों का संक्रमण नहीं हो पाटा था.किन्तु आज इस प्राणी का स्वतंत्र घूमना संभव नहीं है -फैशनेबुल लोगों द्वारा इसका तुरंत शिकार कर लिया जाता है.इसी लिये आज टी. बी. के रोगी बढ़ते जा रहे हैं.

क्या सरकारी और क्या निजी चिकित्सक आज सभी चिकित्सा को एक व्यवसाय के रूप में चालक रहे हैं.आचार्य विश्वदेव जी समाज सेवा के रूप में अपने प्रवचनों में रोगों और उनके निदान पर प्रकाश डाल कर जन-सामान्य के कल्याण की कामना किया करते थे और काफी लोग उनके बताये नुस्खों से लाभ उठा कर धन की बचत करते हुए स्वास्थ्य लाभ करते थे जो आज उनके न रहने से अब असंभव सा हो गया है.


विश्व देव  के एक प्रशंसक के नाते मैं "टंकारा समाचार",७ अगस्त १९९८ में छपे मेथी के औषधीय गुणों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.अभी ताजी मेथी पत्तियां बाजार में उपलब्ध हैं आप उनका सेवन कर लाभ उठा सकते हैं.मेथी में प्रोटीन ,वसा,कार्बोहाईड्रेट ,कैल्शियम,फास्फोरस तथा लोहा प्रचुर मात्रा  में पाया जाता है.यह भूख जाग्रत करने वाली है.इसके लगातार सेवन से पित्त,वात,कफ और बुखार की शिकायत भी दूर होती है.
पित्त दोष में-मेथी की उबली हुयी पत्तियों को मक्खन में तल  कर खाने से लाभ होता है.

गठिया में-गुड,आटा और मेथी से बने लड्डुओं से सर्दी में लाभ होता है.


प्रसव के बाद-मेथी बीजों को भून कर बनाये लड्डुओं के सेवन से स्वास्थ्य-सुधार तथा स्तन में दूध की मात्र बढ़ती है.


कब्ज में-रात को सोते समय एक छोटा चम्मच मेथी के दाने निगल कर पानी पीने से लाभ होता है.यह
एसीडिटी ,अपच,कब्ज,गैस,दस्त,पेट-दर्द,पाचन-तंत्र की गड़बड़ी में लाभदायक है.

आँतों की सफाई के लिये-दो चम्मच मेथी के दानों को एक कप पानी में उबाल कर छानने के बाद चाय बना कर पीने से लाभ होता है.

पेट के छाले-दूर करने हेतु नियमित रूप से मेथी का काढ़ा पीना चाहिए.

बालों का गिरना-रोकने तथा बालों की लम्बाई बढ़ने के लिये दानों के चूर्ण का पेस्ट लगायें.

मधुमेह में-मेथी पाउडर का सेवन दूध के साथ करना चाहिए.
मुंह के छाले-दूर करने हेतु पत्ते के अर्क से कुल्ला करना चाहिए.

मुंह की दुर्गन्ध -दूर करने हेतु दानों को पानी में उबाल कर कुल्ला करना चाहिए.

आँखों के नीचे का कालापन -दूर करने के लिये दानों को पीस कर पेस्ट की तरह लगायें.

कान बहना-रोकने हेतु दानों को दूध में पीस कर छानने के बाद हल्का गर्म करके कान में डालें.

रक्त की कमी में-दाने एवं पत्तों का सेवन लाभकारी है.

गर्भ-निरोधक-मेथी के चूर्ण तथा काढ़े से स्नायु रोग,बहु-मूत्र ,पथरी,टांसिल्स,रक्त-चाप तथा मानसिक तनाव और सबसे बढ़ कर गर्भ-निरोधक के रूप में लाभ होता है.

आज के व्यवसायी करण के युग में निशुल्क सलाह देने को हिकारत की नजर से देखा जाता है.आप भी पढ़ कर नजर-अंदाज कर सकते हैं.


Thursday, 31 December 2015

निगेटिव एप्रोच, भ्रष्टाचार और कैंसर का इलाज

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विद्वान लेखक खुद ही लिख रहे हैं कि 22 लाख रुपए खर्च करके भी  वे बचे नहीं फिर निष्कर्ष दे रहे हैं " खूब भ्रष्टाचार करो और रुपया कमाओ। "

सबसे बड़ी बात तो यह है कि पाश्चात्य प्रभाव में 'मूल निवासी आंदोलन' के नाम पर 'चारों वेदों को भाड़ में झोंक दो' मुहिम चला कर इस देश की  जनता को गहरे गर्त में धकेला जा रहा है जिसका दुष्परिणाम अफरा-तफरी के रूप में सामने आ रहा है। 

'वेद' मानव सभ्यता के उद्भव के साथ मानवता के उत्थान के लिए बनाए गए नियम हैं जो 'प्रकृति 'के अनुसार' आचरण करना सिखाते हैं। प्रकृति के विपरीत चलने के कारण दुखों का अंबार खड़ा हो गया है जो किसी न किसी रूप में सामने आता रहता है। 

मनुष्य का प्राकृतिक  नाम 'कृतु' है अर्थात कर्म करने वाला। कर्म तीन प्रकार के होते हैं- सदकर्म, दुष्कर्म व अकर्म। सदकर्म का अच्छा , दुष्कर्म का बुरा  फल मिलता है व अकर्म का भी 'दंड' मिलता है। अकर्म वह कर्म होता है जो किया जाना चाहिए था परंतु किया नहीं गया था। 

जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल पाता है वे आगामी जन्म के लिए  आत्मा के साथ 'सूक्ष्म' रूप से चलने वाले कारण शरीर के 'चित्त' में 'गुप्त' रूप से अंकित होकर संचित रहते हैं। व्यक्ति के जन्म समय की ग्रह-दशा से इसका आंकलन हो जाता है। जब किसी के जन्म के समय लग्न, षष्ठम , अष्टम भाव में किसी से भी 'शनि' व 'मंगल' ग्रह  का परस्पर संबंध हो तो 'कैंसर' रोग होने के संकेत मिल जाते हैं। अब यदि इन ग्रहों का वैज्ञानिक विधि से ( पोंगा पंडितों की लुटेरी पद्धति से नहीं ) शमन हो जाये तो कैंसर रोग होने की संभावना समाप्त हो जाती है। 

आयु का विज्ञान आयुर्वेद  है जो 'अथर्व वेद' का उपवेद है। इसको 'पंचम वेद' भी कहा जाता है। इसकी एक चिकित्सा पद्धति में नौ जड़ी-बूटियों से ऋतु-परिवर्तन के समय सेवन करके शरीर को नीरोग रखने की व्यवस्था की गई थी। दुर्भाग्य यह है कि पौराणिक-पोंगा-पंडितों ने स्वास्थ्य -रक्षा की इस विधि को अपनी आजीविका हेतु शोषण व लूट का एक माध्यम बना कर नया स्वांग रच डाला और इसके शरीर-विज्ञान से संबन्धित महत्व को समाप्त कर डाला है। नवरात्र के नाम पर ढोंग-स्वांग तो सब लोग खुशी-खुशी कर लेते हैं किन्तु उसके वेदोक्त -वैज्ञानिक महत्व को 'एथीज़्म'/मूल निवासी आंदोलन आदि-आदि के नाम पर ठुकरा देते हैं। जब कर्मों का परिणाम सामने आता है तो दिग्भ्रमित होकर अर्थ का और अनर्थ करते रह कर पीड़ित व दुखी होते रहते हैं लुटेरों से लुटना पसंद करते हैं किन्तु 'सत्य' को स्वीकार करना नहीं। 

आज के भीषण रोगों 'कैंसर' का वर्णन 'रक्तबीज' और AIDS का 'कीलक' के रूप में किया गया था। उपचार और समाधान भी दिया गया था किन्तु क्या सवर्ण क्या अवर्ण, क्या दलित क्या पिछड़े सभी पोंगा-पंडितों के बताए ढोंग के रूप में 'नवरात्र' मना कर जीवन को नष्ट कर रहे हैं। वास्तविकता को समझ कर उपचार करना किसी के एजेंडे में शामिल नहीं है। फिर भी  जन साधारण की सेवा में एक बार पुनः प्रस्तुत है :



Friday, 19 June 2015

खुजली की आयुर्वेदिक चिकित्सा --- लक्ष्मण सिंह

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 साभार :
http://www.onlymyhealth.com/ayurveda-itching-in-hindi-1318846129
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 पानी में नीम के पत्ते उबाल कर, उस पानी को ठंडा कर उससे नहाने से खुजली दूर होती है। सरसों के तेल की मालिश करना भी लाभप्रद है। नहाते समय पानी में डेटोल की कुछ बूंदें डाल देने से खुजली दूर होती है। तुलसी के पत्तों का रस खुजली वाले स्थान पर घिसने से भी लाभ होता है। नहाते समय पानी की बाल्टी में एक नींबू का रस डाल लिया जाये तो इससे भी त्वचा को आराम मिलता है। पानी में चने के आटे को मिलाकर शरीर पर लगाने से भी लाभ होता है। एक चम्मच टमाटर का रस, दो चम्मच नारियल के तेल में मिलाकर शरीर पर मालिश करें। फिर 20-25 मिनट बाद नहा लें। इससे खुजली दूर हो जाएगी।
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खुजली होने पर साबुन का प्रयोग कम कर दें क्योंकि जितना ज्यादा स्किन रुखी होगी उतनी ही खुजली बढ़ेगी। अगर आप साबुन के बिना नहीं रह पा रहें हैं तो सौम्य साबुन का प्रयोर करें। कभी कभी त्‍वचा को सुगंधित पदार्थों, क्रीम, लोशन, शैंपू, जूतों या कपड़ों में पाए जाने वाले रसायनों से भी एलर्जी हो जाती है। इसलिए सही तरीके का लोशन इत्‍यादि ही लगाएं।थोडा सा कपूर लेकर उसमें दो बड़े चम्‍मच नारियल का तेल मिलाकर खुजली वाले स्‍थान पर नियमित लगाने से खुजली मिट जाती है। हां, तेल को हल्‍का सा गरम करके ही कपूर में मिलाए।
साभार :
http://www.onlymyhealth.com/health-questions-answers-hindi/tips-for-body-etching-in-hindi-35604
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होम्योपैथी :


Saturday, 14 March 2015

आयुर्वेद द्वारा मस्से,स्वाईन फ्लू आदि का उपचार

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मस्से:
मस्से सुंदरता पर दाग की तरह दिखाई देते हैं। मस्से
होने का मुख्य कारण पेपीलोमा वायरस है। त्वचा पर
पेपीलोमा वायरस के आ जाने से छोटे, खुरदुरे कठोर पिंड बन
जाते हैं, जिन्हें मस्सा कहा जाता है। पहले मस्से
की समस्या अधेड़ उम्र के लोगों में अधिक
होती थी, लेकिन आजकल युवाओं में
भी यह समस्या होने लगी है। यदि आप
भी मस्सों से परेशान हैं तो इनसे राहत पाने के लिए कुछ
घरेलू उपायों को अपना सकते हैं। आइए, जानते हैं कुछ ऐसे
ही घरेलू नुस्खों के बारे में....
1. बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर
इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म
हो जाते हैं।
2.बरगद के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत
ही असरदार होता है। इसके रस को त्वचा पर लगाने से
त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने-आप गिर
जाते हैं।
3. ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ
मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर गुनगुने
पानी से धो लें। मस्से खत्म हो जाएंगे।
4. खट्टे सेब का जूस निकाल लीजिए। दिन में कम से कम
तीन बार मस्से पर लगाइए। मस्से धीरे-
धीरे झड़ जाएंगे।
5. चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में
भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं। दस मिनट बाद गर्म
पानी से फेस धो लें। कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे।
6. आलू को छीलकर उसकी फांक
को मस्सों पर लगाने से मस्से गायब हो जाते हैं।
7. कच्चा लहसुन मस्सों पर लगाकर उस पर
पट्टी बांधकर एक सप्ताह तक रहने दें। एक सप्ताह
बाद पट्टी खोलने पर आप पाएंगे कि मस्से गायब हो गए
हैं।
8. मस्सों से जल्दी निजात पाने के लिए आप एलोवेरा के
जैल का भी उपयोग कर सकते हैं।
9. हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे
रोजाना मस्सों पर लगाएं।
10. ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगाएं। ऐसा दिन में
लगभग 3 या 4 बार करें। मस्से गायब हो जाएंगे।
11. केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर
रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में दो बार करें
और लगातार करते रहें, जब तक कि मस्से खत्म
नहीं हो जाते।
12. मस्सों पर नियमित रूप से प्याज मलने से भी मस्से
गायब हो जाते हैं।
13. फ्लॉस या धागे से मस्से को बांधकर दो से तीन
सप्ताह तक छोड़ दें। इससे मस्से में रक्त प्रवाह रुक जाएगा और
वह खुद ही निकल जाएगा।
14. अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगाएं।
इससे मस्से नरम पड़ जाएंगे और धीरे-धीरे
गायब हो जाएंगे।
15. अरंडी के तेल की जगह कपूर के तेल
का भी उपयोग कर सकते हैं।
 Reader:- Subin mishra
https://www.facebook.com/oldveda/posts/889261701125845 



Friday, 21 February 2014

प्राचीन भारतीय परम्पराएँ शुद्ध वैज्ञानिक हैं

यह बिलकुल सही है कि आजकल लोग प्राचीन भारतीय परम्पराओं का इसलिए मखौल उड़ाते हैं क्योंकि उनके आधुनिक विज्ञान के अध्यन में उनको शामिल नहीं किया गया है। आधुनिक विज्ञान पश्चिम से परावर्तित होकर आया है जबकि प्राचीन विज्ञान भारत से अरब होता हुआ पश्चिम पहुंचा था। खुद को श्रेष्ठ बताने हेतु पश्चिम के वैज्ञानिकों ने भारतीय वैज्ञानिक परम्पराओं को 'अवैज्ञानिक' घोषित कर दिया था और हमारे लोगों ने उसको ब्रह्म-वाक्य मान कर सिरोधार्य कर लिया था।लेकिन निम्नाकित स्कैन कापियों से सिद्ध होता है कि आज भी हमारी अपनी प्राचीन मान्यताएँ ही शुद्ध वैज्ञानिक हैं न कि आधुनिक वैज्ञानिक मान्यताएँ जैसा कि अब खुद आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं। 

हमारे देश में प्राचीन कालीन नियम यह था कि सुबह का भोजन अधिकतम दिन के 12 बजे तक और रात्रि का भोजन सूर्यास्त से पहले कर लिया जाये और सूर्यास्त के बाद पानी न पिया जाये । इसके पीछे विज्ञान का यह नियम था कि शरीर का अग्नि तत्व सूर्य के प्रकाश में खाये  गए भोजन को पचा कर आवश्यक ऊर्जा संचय कर सके। रात्रि काल में चंद्रमा के प्रकाश में शरीर का जल तत्व प्रभावी रहता है अतः अतिरिक्त पानी पीने की आवश्यकता नहीं है।इसी प्रकार अन्य जीवनोपयोगी नियम निर्धारित थे और लोग उनका पालन कर सुखी थे। किन्तु जबसे इन नियमों की अवहेलना हुई देश और देशवासियों का पतन आरंभ हो गया और अंततः देश गुलाम हो गया। गुलामी में अपना अर्वाचीन सब कुछ ठुकरा दिया गया-भुला दिया गया जिसका नतीजा आज की वीभत्स समस्याएँ हैं।  

और  आधुनिक दक़ियानूसी वैज्ञानिकों ने इस प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक सत्यता को अवैज्ञानिक कह कर नकार दिया नतीजतन अब लोग सुबह का भोजन शाम के तीन-चार बजे तथा रात्री भोजन 10-11 बजे करते है और तमाम बीमारियों का शिकार होकर डॉ व अस्पताल के चक्कर काट-काट कर खुद को 'आधुनिक' व 'प्रगतिशील' होने का स्वांग रचते हैं। इस स्वांग को 'ढोंग' और अवैज्ञानिक -अंधविश्वास अब अत्याधुनिक खोजें ही सिद्ध कर रही हैं।

 अतः आज समय की मांग है कि इस धरती के हम सब प्राणी महर्षि स्वामी दयानंद 'सरस्वती' के इस आव्हान कि 'फिर से वेदों की ओर चलो' का अनुपालन करें तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिना : ........ सर्वे भवन्तु निरामया : ' रहें। 




Friday, 1 November 2013

धन तेरस -धन्वन्तरी जयंती -स्वस्थ जीवन का उत्सव ---विजय राजबली माथुर

आप क़े मानसिक -शारीरिक स्वास्थ्य की खुशहाली ही हमारी दीवाली है । आप को सपरिवार दीपावली की शुभकामनाएं । 
दीपावली का प्रथम दिन अब धन -तेरस क़े रूप में मनाते हैं जिसमे  नया बर्तन खरीदना अनिवार्य बताया जाता है और भी बहुत सी खरीदारियां की जाती हैं । एक वर्ग -विशेष को तो लाभ हो जाता है शेष सम्पूर्ण जनता ठगी जाती है।  आयुर्वेद जगत क़े आदि -आचार्य धन्वन्तरी का यह जनम -दिन है जिसे धन -तेरस में बदल कर विकृत कर दिया गया है। 
 आज भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक अवनति  क़े युग में होली और दीवाली दोनों पर्व वैज्ञानिक पद्धति से हट कर मनाये जा रहे हैं । होली पर अबीर ,गुलाल और टेसू क़े फूलों का स्थान रासायनिक रंगों ने ले लिया है जिसने इस पर्व को विकृत कर दिया है। दीपावली पर पटाखे -धमाके किये जाने लगे हैं जो आज क़े मनुष्य की क्रूरता को उजागर करते हैं । मूल पर्व की अवधारणा सौम्य और सामूहिक थी । अब ये दोनों पर्व व्यक्ति की सनक ,अविद्या ,आडम्बर आदि क़े प्रतीक बन गए हैं । इन्हें मनाने क़े पीछे अब समाज और राष्ट्र की उन्नति या मानव -कल्याण उद्देश्य नहीं रह गया है। 



 आचार्य -धन्वन्तरी आयुर्वेद क़े जनक थे । आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है इस चिकित्सा -पद्धति में प्रकृति क़े पञ्च -तत्वों क़े आधार पर आरोग्य किया जाता है। 
भूमि +जल =कफ़
वायु +आकाश = वात
अग्नि  = पित्त

पञ्च -तत्वों को आयुर्वेद में वात ,पित्त ,कफ़ तीन वर्गों में गिना जाता है । जब तक ये तत्व शरीर को धारण करते हैं 'धातु' कहलाते हैं ,जब शरीर को दूषित करने लगते हैं तब 'दोष' और जब शरीर को मलिन करने लगते हैं तब 'मल' कहलाते हैं । कलाई -स्थित नाडी पर तर्जनी ,मध्यमा और अनामिका उँगलियों को रख कर अनुमान लगा लिया जाता है कि शरीर में किस तत्व की प्रधानता या न्यूनता चल रही है और उसी क़े अनुरूप रोगी का उपचार किया जाता है । (अ )तर्जनी से वात ,(ब )मध्यमा से पित्त तथा (स )अनामिका से कफ़ का ज्ञान किया जाता है। 

ज्योतिष में हम सम्बंधित तत्व क़े अधिपति ग्रह क़े मन्त्रों का प्रयोग करके तथा उनके अनुसार हवन में आहुतियाँ दिलवा कर उपचार करते हैं । साधारण स्वास्थ्य -रक्षा हेतु सात मन्त्र उपलब्ध हैं और आज की गंभीर समस्या सीजेरियन से बचने क़े लिए छै विशिष्ट मन्त्र उपलब्ध हैं जिनके प्रयोग से सम्यक उपचार संभव है एक प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य (और ज्योतिषी  ) जी ने पंजाब -केसरी में जनता की सुविधा क़े लिए बारह बायोकेमिक दवाईओं को बारह राशियों क़े अनुसार प्रयोगार्थ एक सूची लगभग छब्बीस  वर्ष पूर्व दी थी उसे आपकी जानकारी क़े लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ सूर्य की चाल पर आधारित इस राशि क्रम  में बायोकेमिक औद्धि का प्रयोग करके स्वस्थ रहा जा सकता है और रोग होने पर उस रोग की दवाई क़े साथ इस अतिरिक्त दवाई का प्रयोग जरनल टॉनिक क़े रूप में किया जा सकता है :-

       
बायोकेमिक दवाईयां होम्योपैथिक स्टोर्स पर ही मिलती हैं और इनमे कोई साईड इफेक्ट  या रिएक्शन नहीं होता है ,इसलिए स्वस्थ व्यक्ति भी इनका सेवन कर सकते हैं .इन्हें 6 x  शक्ति में 4 T D S ले सकते हैं। 

अंग्रेजी  कहावत है -"A healthy  mind  in  a healthy body  only"लेकिन मेरा मानना है कि "Only  the healthy  mind will keep the body healthy ."मेरे विचार की पुष्टि यजुर्वेद क़े अध्याय ३४ क़े (मन्त्र १ से ६) इन छः  वैदिक मन्त्रों से भी होती है ।  इन मन्त्रों का पद्यात्माक भावानुवाद  श्री ''मराल'' जी ने किया है आप भी सुनिये और अमल कीजिए :-