Friday, 10 April 2026

जन -चिकित्सा है - होम्योपैथी ------ विजय राजबली माथुर

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10 अप्रैल -महात्मा हैनीमेन जयंती पर विशेष : 


डॉ हैनीमेन का जन्म 10 अप्रैल सन 1755 ई .को जर्मन साम्राज्य के अंतर्गत सेकसनी प्रदेश के 'माइसेन 'नामक एक छोटे से गाँव मे हुआ था और 02 जूलाई सन 1843 ई .मे नवासी वर्ष की आयु मे उनका निधन हुआ। "कीर्तिर्यस्य स जीवति"= इस असार संसार को छोडने से पूर्व डॉ हैनीमेन 'चिकित्सा-विधान'मे एक अक्षय कीर्ति स्थापित कर गए। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार डॉ हैनीमेन जर्मनी के एक कीर्ति प्राप्त उच्च -पदवी धारी एलोपैथिक चिकित्सक थे। अनेकों बड़े-बड़े चिकित्सालयों मे बहुत से रोगियों का इलाज करते हुये उनके ध्यान मे यह बात आई कि अनुमान से रोग निर्वाचन (DIAGNOSIS) कर,और कितने ही बार अनुमान पर निर्भर रह कर दवा देने के कारण भयंकर हानियाँ होती हैं,यहाँ तक कि बहुत से रोगियों की मृत्यु तक हो जाया करती है। इन बातों से उन्हें बेहद वेदना हुई और अंततः उन्होने इस भ्रमपूर्ण चिकित्सा (एलोपैथी )द्वारा असत उपाय से धन-उपार्जन करने की लालसा ही त्याग दी एवं निश्चय किया कि अब वह पुस्तकों का अनुवाद करके अपना जीविकोपार्जन करेंगे। इसी क्रम मे एक दिन एक-'मेटिरिया मेडिका' का अनुवाद करते समय उन्होने देखा कि शरीर स्वस्थ रहने पर यदि सिनकोना की छाल सेवन की जाये तो 'कम्प-ज्वर'(जाड़ा-बुखार)पैदा हो जाता है और सिनकोना ही कम्प-ज्वर की प्रधान दवा है। यही बोद्ध डॉ हैनीमेन की नवीन चिकित्सा पद्धति के आविष्कार का मूल सूत्र हुआ। इसके बाद इसी सूत्र के अनुसार उन्होने अनेकों भेषज-द्रव्यों का स्वंय सेवन किया और उनसे जो -जो लक्षण पैदा हुये ,उनकी परीक्षा की । यदि किसी रोगी मे वे लक्षण दिखाई देते तो उसी भेषज-द्रव्य को देकर वह रोगी को 'रोग-मुक्त'भी करने लगे।


डॉ हैनीमेन अभी तक पहले की भांति एलोपैथिक अर्थात स्थूल मात्रा मे ही दवाओं का प्रयोग करते थे। परंतु उन्हे यह एहसास हुआ कि रोग,आरोग्य हो जाने पर भी कुछ दिन बाद रोगी मे दुबारा बहुत सारे अनेक लक्षण पैदा हो जाते हैं। जैसे किनाइन का सेवन करने पर ज्वर तो आरोग्य हो जाता है ,परंतु उसके बाद रोगी मे --रक्त हीनता,प्लीहा,यकृत,पिलई,शोथ (सूजन ),धीमा बुखार आदि अनेक नए-नए उपसर्ग पैदा होकर रोगी को एकदम जर्जर बना डालते हैं। बस उसी एहसास के बाद से उन्होने दवा की मात्रा घटानी आरम्भ कर दी। इससे उन्हें यह मालूम हुआ कि,परिमाण या मात्रा भले ही कम हो ,आरोग्य दायिनी शक्ति पहले की तरह ही मौजूद रहती है और दुष्परिणाम भी पैदा नहीं होते।

अन्त मे उन्होने दवा का परिमाण क्रमशः भग्नांश के आकार मे प्रयोग करना आरम्भ किया और वे भग्नांश दवाएं फ्रेंच स्प्रिट,दूध की चीनी (शुगर आफ मिल्क)और चुयाया हुआ पानी (डिस्टिल्ड वाटर)इत्यादि औषद्ध-गुण विहीन चीजों के साथ मिला कर प्रयोग करना शुरू किया। यही नियम इस समय -'सदृश्य-विधान' कहलाता है जिसे डॉ हैनीमेन के नाम पर 'होम्योपैथिक-चिकित्सा' कहा जाता है। 

होम्योपैथी का 'सदृश्य -विधान' हमारे देश के 'आयुर्वेद' के सदृश्य सिद्धान्त से मेल खाता है। होम्योपैथी दवाएं होती भी हैं बहुत कम कीमत की। पहले होम्योपैथी चिकितक कोई कनसलटेशन चार्ज या परामर्श शुल्क भी नहीं लेते थे। एलोपैथी चिकित्सकों की भांति होम्योपैथी चिकित्सक कोई गरूर या घमंड भी नहीं रखते थे। अधिकांश होम्योपैथी चिकित्सकों के पीछे यह स्लोगन लिखा होता था-I TREATS,HE CURES.तब यह चिकित्सा पद्धति जनता की प्रिय चिकित्सा पद्धति थी।

गत 4-5 वर्षों से एलोपैथी चिकित्सा क्षेत्र मे फैले कमीशन वाद ने इस जन-चिकत्सा पद्धति (होम्योपैथी )को भी अपनी गिरफ्त मे ले लिया है। अब डॉ को कमीशन की रकमे बढ़ा दी गई हैं और विदेश दौरे के पेकेज जैसे एलोपैथी डॉ को मिलते थे वैसे ही मिलने लगे हैं। बाजार वाद के प्रभाव ने इस चिकित्सा पद्धति को भी मंहगा बनाना प्रारम्भ कर दिया है। यह महात्मा हैनीमेन की सोच के विपरीत है। आज जब हम डॉ हैनीमेन की 258 वी जयंती मना रहे हैं तो एक बार इस बात का भी मनन करें कि जिस एलोपैथी चिकित्सा की बुराइयों से त्रस्त होकर डॉ हैनीमेन ने नई जनोपयोगी चिकित्सा पद्धति का सृजन किया था उसे पुनः एलोपैथी की बुराइयों मे फँसने से बचाया जाये। वही डॉ हैनीमेन को सच्ची श्रद्धांजली होगी। 

Tuesday, 1 July 2025

अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था ------ डॉ. अनन्या सरकार

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यह कोई मज़ाक नहीं है...🙏
पढ़ें और यदि अच्छा लगे तो दूसरों को भी पढ़ने का अवसर दें!! ======   मुकेश माथुर 

!!!!! अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था !!!!!
डॉ. अनन्या सरकार

दो-तीन दिन बुखार रहा, दवा न लेते तो भी ठीक हो जाते, शरीर अपने आप कुछ दिनों में ठीक हो जाता। लेकिन आप डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर साहब ने शुरुआत में ही ढेर सारे टेस्ट लिख दिए। टेस्ट रिपोर्ट में बुखार का कोई खास कारण तो नहीं मिला, लेकिन कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर थोड़े से बढ़े हुए पाए गए, जो सामान्य इंसानों में थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे होना आम बात है।

बुखार तो चला गया, लेकिन अब आप बुखार के मरीज नहीं रहे। डॉक्टर साहब ने बताया — आपका कोलेस्ट्रॉल ज़्यादा है और शुगर थोड़ी अधिक है, यानी आप ‘प्री-डायबेटिक’ हैं। अब आपको कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए दवाएं लेनी होंगी। साथ ही खाने-पीने में बहुत सारी पाबंदियाँ लगा दी गईं। आपने खाने में पाबंदियाँ भले न मानी हों, लेकिन दवाएं लेना नहीं भूले।

ऐसे तीन महीने बीते। फिर टेस्ट कराया गया। कोलेस्ट्रॉल कुछ कम हुआ, लेकिन अब ब्लड प्रेशर थोड़ा बढ़ा हुआ पाया गया। उसे कंट्रोल करने के लिए एक और दवा दी गई। अब आपकी दवाओं की संख्या हो गई 3।

इतनी बात सुनने के बाद आपकी चिंता बढ़ने लगी। "अब क्या होगा?" — इसी चिंता में आपकी नींद उड़ने लगी। डॉक्टर ने नींद की दवा भी शुरू कर दी। अब दवाओं की संख्या 4 हो गई।

इतनी सारी दवाएं खाते ही अब आपको पेट में जलन शुरू हो गई। डॉक्टर बोले — खाने से पहले एक गैस की टैबलेट खाली पेट लेना होगा। दवाओं की संख्या बढ़कर 5 हो गई।

ऐसे ही छह महीने बीत गए। एक दिन सीने में दर्द हुआ तो आप भागे अस्पताल की इमरजेंसी में। डॉक्टर ने सब चेकअप करके कहा — "समय पर आ गए, नहीं तो बहुत बड़ा हादसा हो सकता था।" फिर कुछ विशेष जाँचों की सलाह दी गई।

कई महंगे टेस्ट के बाद डॉक्टर बोले — "पुरानी दवाएं तो चलती रहेंगी, अब हार्ट की दो दवाएं और जुड़ेंगी। साथ ही आपको एक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) से भी मिलना होगा।" अब आपकी दवाओं की संख्या हो गई 7।

हार्ट स्पेशलिस्ट के कहने पर आप एंडोक्रिनोलॉजिस्ट के पास गए। उन्होंने शुगर के लिए एक और दवा और थायरॉइड थोड़ा बढ़ा होने पर एक और दवा जोड़ दी।

अब आपकी कुल दवाएं हो गईं 9।

अब आप अपने मन में यह मानने लगे कि आप बहुत बीमार हैं — हार्ट के मरीज, शुगर के मरीज, अनिद्रा के मरीज, गैस के मरीज, थायरॉइड के मरीज, किडनी के मरीज, आदि-आदि।

आपको यह नहीं बताया गया कि आप अपनी इच्छाशक्ति, आत्मबल और जीवनशैली सुधार कर स्वस्थ रह सकते हैं। बल्कि आपको बार-बार यह बताया गया कि आप एक "गंभीर रोगी" हैं, निर्बल हैं, असमर्थ हैं, एक टूटे हुए व्यक्ति हैं!

ऐसे ही और छह महीने बीतने के बाद दवाओं के साइड इफेक्ट से आपको पेशाब की कुछ समस्याएं हुईं। फिर रूटीन चेकअप में पता चला कि आपकी किडनी में भी कुछ समस्या है। डॉक्टर ने फिर कई टेस्ट करवाए।

रिपोर्ट देखकर डॉक्टर बोले — "क्रिएटिनिन थोड़ा बढ़ा हुआ है, लेकिन दवाएं नियमित चलती रहीं तो चिंता की बात नहीं।" और दो दवाएं और जोड़ दी गईं।

अब आपकी कुल दवाओं की संख्या हो गई 11।

अब आप भोजन से ज्यादा दवा खा रहे हैं, और दवाओं के अनेक दुष्प्रभावों से आप धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं!!

जबकि जिस बुखार की वजह से आप सबसे पहले डॉक्टर के पास गए थे, अगर डॉक्टर साहब कहते:

"चिंता की कोई बात नहीं। यह मामूली बुखार है, कोई दवा लेने की ज़रूरत नहीं। कुछ दिन आराम कीजिए, भरपूर पानी पिएं, ताजे फल-सब्जियाँ खाएँ, सुबह टहलने जाइए — बस, इतना ही काफी है। दवा की ज़रूरत नहीं।"

तो फिर डॉक्टर साहब और दवा कंपनियों का पेट कैसे भरता❓

और सबसे बड़ा सवाल: किस आधार पर डॉक्टर मरीजों को कोलेस्ट्रॉल, हाई बीपी, डायबिटीज, हार्ट डिज़ीज और किडनी डिज़ीज़ घोषित कर रहे हैं❓❓❓

ये मानदंड कौन तय करता है❓

आइए, थोड़ा विस्तार से जानें —
★ 1979 में जब ब्लड शुगर 200 mg/dl से ऊपर होता था, तभी व्यक्ति को डायबिटिक माना जाता था। उस समय दुनिया की सिर्फ 3.5% आबादी को टाइप-2 डायबिटिक माना जाता था।

★ 1997 में इंसुलिन बनाने वाली कंपनियों के दबाव में यह स्तर घटाकर 126 mg/dl कर दिया गया। इससे डायबिटिक मरीजों की संख्या 3.5% से बढ़कर 8% हो गई — यानी बिना किसी लक्षण के 4.5% और लोग रोगी बना दिए गए! 1999 में WHO ने भी इस पैमाने को मान लिया।

इंसुलिन कंपनियों ने जबरदस्त मुनाफा कमाया और नई फैक्ट्रियाँ खोलीं।

★ 2003 में ADA (American Diabetes Association) ने फास्टिंग ब्लड शुगर 100 mg/dl को डायबिटीज का मानक घोषित किया। इसके चलते बिना कारण 27% लोग डायबेटिक रोगी घोषित कर दिए गए।

★ अब ADA के अनुसार पोस्ट प्रांडियल (भोजन के बाद) 140 mg/dl को डायबिटीज का संकेत माना जाता है। इससे दुनिया की लगभग 50% आबादी डायबेटिक घोषित हो चुकी है — जबकि इनमें से कई वास्तविक मरीज नहीं हैं।

भारतीय दवा कंपनियाँ इसे और नीचे, 5.5% HbA1c पर लाने की कोशिश कर रही हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मरीज बन जाएँ और दवा बिके।

जबकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि HbA1c 11% तक डायबिटीज नहीं मानी जानी चाहिए।

एक और उदाहरण:
2012 में अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रसिद्ध दवा कंपनी पर $3 बिलियन का जुर्माना लगाया। आरोप था कि उनकी डायबिटीज की दवा से 2007–2012 के बीच हार्ट अटैक के कारण मरीजों की मृत्यु दर 43% बढ़ गई थी।

कंपनी को यह पहले से पता था, लेकिन उन्होंने मुनाफे के लिए जानबूझकर इसे छुपाया। इसी अवधि में उन्होंने 300 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया।

यही है आज की 'अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था'!!
सोचिए... और सोचना शुरू कीजिए.

#निश्चित रूप से संग्रहित
सभी स्वस्थ रहें, खुश रहे

Friday, 28 May 2021

ग्लूकोमा ( काला मोतिया ) का होम्योपेथिक इलाज ------

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Monday, 15 June 2020

कोरोना,शरीर,पुदीना ---

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Sunday, 31 May 2020

भिंडी , नमक,तरबूज, कटहल, दही ------

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