जानिए कैसे महज 121 करोड़ में बिक गई देश की इकलौती सरकारी आयुर्वेदिक कंपनी।
✍️रश्मि दीक्षित।
जन-सरोकार और सरकारी मुनाफे की यह कैसी बोली?
देश के सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की प्रशासनिक रफ्तार एक बार फिर चर्चा में है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाली देश की बेहद प्रतिष्ठित और इकलौती केंद्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी ‘इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड’ (IMPCL) का पूर्ण निजीकरण कर दिया गया है। दिल्ली की एक निजी फार्मा कंपनी ने करीब 121 करोड़ रुपये की बोली लगाकर इस सरकारी संस्थान का सौ फीसदी मालिकाना हक और पूरा प्रबंधन अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस विनिवेश को भले ही सरकारी नीतियों की सफलता और एक पारदर्शी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के तार्किक अंत के रूप में पेश किया जा रहा हो, लेकिन यह फैसला नीतिगत प्राथमिकताओं और लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर कई गंभीर सवाल छोड़ जाता है।
पहला और सबसे बुनियादी सवाल तो उस स्थापित तर्क पर ही उठता है, जिसके तहत घाटे में चल रहे बीमार सरकारी उपक्रमों को देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ मानकर बेचा जाता रहा है। IMPCL का मामला इसके बिल्कुल उलट है। यह न तो कोई बीमार इकाई थी और न ही जनता के टैक्स के पैसों पर पलने वाला सफेद हाथी। यह लगातार मुनाफा कमाने वाली, एक मजबूत वित्तीय आधार वाली और करीब ढाई सौ करोड़ रुपये से अधिक के सालाना टर्नओवर वाली कंपनी रही है। देश भर के जन औषधि केंद्रों और केंद्रीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों को बेहद कम दरों पर प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाली आयुर्वेदिक व यूनानी दवाएं पहुंचाने का जिम्मा इसी के कंधों पर था। ऐसे में एक कमाऊ और जन-उपयोगी संस्थान को महज 121 करोड़ रुपये जैसी मामूली रकम के बदले निजी मुनाफे की मंडी में झोंक देना किसी भी तर्क से गले नहीं उतरता।
इस तरह के फैसलों का जो सबसे स्याह और मानवीय पक्ष अक्सर फाइलों के नीचे दबा रह जाता है, वह है इससे प्रभावित होने वाली स्थानीय जिंदगियां। उत्तराखंड के अल्मोड़ा (मोहान) स्थित इस कंपनी के कारखाने के इर्द-गिर्द एक पूरा सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना बुना हुआ है। बरसों से विनिवेश का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे कर्मचारियों और स्थानीय आंदोलनकारियों की आवाज को इस सौदे की खड़खड़ाहट में अनसुना कर दिया गया। इस निजीकरण से न केवल वहां काम करने वाले सैकड़ों नियमित और संविदा कर्मियों के रोजगार की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है, बल्कि उन हजारों स्थानीय सीमांत किसानों और जड़ी-बूटी संग्राहकों की आजीविका भी दांव पर लग गई है, जो सीधे इस कारखाने को अपनी उपज बेचते थे। जिस राज्य का युवा रोजगार की तलाश में पहले से ही पलायन का दंश झेल रहा हो, वहां के एक आत्मनिर्भर ग्रामीण औद्योगिक स्तंभ को इस तरह कमजोर करना स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने जैसा है।
नीतिगत स्तर पर सरकार ने इस वित्तीय वर्ष के लिए विनिवेश और परिसंपत्ति मुद्रीकरण के जरिए 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। ऐसा लगता है कि इसी बजटीय लक्ष्य और वित्तीय घाटे को पाटने की आपाधापी में IMPCL जैसी संवेदनशील और पारंपरिक स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं की बलि चढ़ाई जा रही है। भले ही यह प्रक्रिया साल 2017 से ही ठंडे बस्ते में पड़ी थी, लेकिन हाल के महीनों में जिस तेजी से कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर इस सौदे को अंतिम रूप दिया गया, उसने इसकी सामाजिक संवेदनशीलता को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया।
अंतिम सवाल यह है कि क्या 'वेलफेयर स्टेट' यानी लोक-कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी सिर्फ वित्तीय आंकड़ों को दुरुस्त करने तक सीमित होनी चाहिए? जब हम अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों, आयुर्वेद और आत्मनिर्भरता का ढोल वैश्विक मंचों पर पीट रहे हैं, ठीक उसी वक्त देश के भीतर अपनी ही उस रीढ़ को निजी हाथों में सौंप रहे हैं जो इन दवाओं की शुद्धता और जनता तक उनकी किफायती पहुंच की गारंटी थी। चंद रुपयों के बजटीय संतुलन के लिए आम जनता की सस्ती दवाओं, गरीब मजदूरों के अधिकार और किसानों की उम्मीदों का यह सौदा किसी भी प्रगतिशील समाज में उचित नहीं ठहराया जा सकता। विनिवेश की यह अंधी दौड़ कहीं लोक-हित के बुनियादी सिद्धांतों का ही विनिवेश न कर दे।
रश्मि दीक्षित।
